Sharad Navratri 2021

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નવરાત્રી ૨૦૨૧

Navratri Ghatsthapn Pujan Vidhi Aur Navratra ki purna jankari

નવરાત્રીપર્વનુંભારતમાંતથાજે-જેદેશોમાંભારતીયોવસતાંહોયતેમનાંમાટેખૂબજમહત્વનુંપર્વછે.શરદનવરાત્રીક્યારથીશરુથશેઅનેક્યારેપૂર્ણથશેતથાઆઠમ,નોમઅનેદશેરાક્યારેછેતેનીમાહિતીતેમજઘટસ્થાપનઅનેઆઠમનોહવનક્યારેકરવોતેપણસૂચિતકરીશું.

પંચાગઅનુસારનવરાત્રીપર્વઆસોસુદીએકમતા.૭-૧૦-૨૦૨૧નેગુરુવારનવરાત્રઆરંભ

નવરાત્રીનાંપ્રથમદિવસેઘટસ્થાપનકરવાનુંહોયતેસ્થાપનકેવીરીતેકરવુંતેનીવિધિશુંછેઅનેદિવસદરમિયાનમાંકયોસમયવધારેઉત્તમછેતેજોઈએ.

ઘટસ્થાપનમુહૂર્ત૦૬:૩૨AM to ૭:૧૯ AM

ઘટસ્થાપનઅભિજિતમુહૂર્ત૧૨:૦૨PM to ૧૨:૪૯ PM

Navratri is a very important festival in India and in the countries where Indians live. We will also indicate when Sharad Navratri will start and end and when the 8th, Nome and Dussehra are, as well as the installation of the Ghat and the Havan of the 8th.According to the Panchag, Navratri festival Aso Sudi Ekam Navratri begins on Date 7-10-2021 Thursday

What is the ritual of how to install Ghat on the first day of Navratri and what is the best time of the day.

Ghat Sthapan Time06:32 AM to 7:19 AM

Ghat Sthapan abhijit Muhurat Time12:02  PM to 12:49  PM

नवरात्रि २०२१

नवरात्रि भारत में और उन देशों में जहां भारतीय रहते हैं, एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार है। हम यह भी बताएंगे कि शरद नवरात्रि कब शुरू होगी और कब खत्म होगी और अष्टमी, नवमी और दशहरा कब होगी, साथ ही घट स्थापन और अष्टमी का हवन किस दिन करना हैं ।

पंचाग के अनुसार नवरात्रि पर्व आसो सुदी एकम (प्रतिपदा) ता. 7-10-2021गुरुवार से शुरू हो रहा है

नवरात्रि के पहले दिन आपको यह जानने की जरूरत है कि घट को स्थापित करने की प्रक्रिया क्या है और दिन का सबसे अच्छा समय कौनसा है।घट स्थापनसमय०६:३२  AM to ७:१९ AM घट स्थापन अभिजित मुहूर्त १२:०२ PM to १२:४९ PM 

संप्रदाय भेद से नवरात्र की नव शक्तिया भारत वर्ष में नवरात्रउत्सुकता से मनाया जाता हैं नवरात्रीकातीन भाग हैं प्रथम तीन दिन दुर्गा महाकाली का हैं यानी दुर्गा का हैं औरयहप्रधान पूजन हैं द्वितीय विभागकेतीन दिन महालक्ष्मी का हैं पहला तीन नवरात्र महाकाली का हैं इसमें तीन देवीया समाती हैंशैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघण्टा द्वितीय विभागमें महालक्ष्मी के तीन दिन इसमें कूष्मांडा, स्कन्दमाताऔर कात्यायनी तिसरे विभाग में भगवती महासरस्वती की प्रधान पूजा होती हैं तिथि को ही स्वरुप माना हैं नव तिथि आधार पर ही नवरात्र किये जाते हैं प्रत्येक तिथि की पूजा उस तिथि की महा शक्ति को अर्पण करें इसमेंकालरात्री, महागौरी, सिद्धिदात्री समाती हैं और भद्रकाली का महा स्वरुप षोडश भूजा दुर्गा का ध्यान भी बताया गया हैं उग्र चण्डाकल्प विधान मेंअश्विन कृष्णा नवमी में आद्रा नक्षत्र हो तो श्रेष्ठ हैं अन्यथा घट स्थापन से लेकर नवमी पर्यन्त नवदुर्गा का पूजन करें उग्र चण्डाकल्प में नवदुर्गाओ के नाम इस प्रकार हैं रुद्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चन्दनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा, अतिचण्डिका, उग्रचण्डिका यह नव देवीया हैं शैव संप्रदाय के अनुसार शारदीय नवरात्र में प्रत्येक तिथि की तिथि देवता इस प्रकार हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री यह नव देवीया भारत वर्ष में और दक्षिण भारत में शैलपुत्री इत्यादि नव शक्तिओ का पूजन स्थूल रूप सेकिया जाता हैं दीक्षित साधक बहुत्तररूप से जिन नव देवीओ की उपासना करते हैं वे इस प्रकार हैं

प्रथमा वन दुर्गा च द्वितीया शूलिनी मता।

तृतीया जातवेदा तु चतुर्थीशान्तिरीरिता ॥

पंचमी शबरी चेति ज्वालादुर्गाततः परम् ।

सप्तमी लवणा चेति आसुरी अष्टमीस्मृता ॥

नवमी दीपदुर्गेति नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ॥

वैष्णव संप्रदाय के अनुसार नवमहाशक्तिया इस प्रकार हैं जिसकी पूजा नवरात्री में नव दिन की जाती हैं (१)श्रीदेवी (२) अमृतोद्भवा (३) कमला (४) चन्द्रशोभिनी (५) विष्णुपत्नी (६) वैष्णवी (७) वरारोहा (८) हरिवल्लभा (९) शार्ङ्गिणी।वैष्णव संप्रदाय के अनुसार हस्तनक्षत्र से उत्तराषाढ़ा तक९ दिन कीगणना की जाती हैं औरश्रवणनक्षत्र (१०वे दिन) जो विष्णु का प्रिय नक्षत्र होता है उस दिन तिरुपति तिरुमल में श्री वेंकटेश्वर का ब्रह्मोत्सव मनाया जाता हैं। हस्त नक्षत्र से उत्तराषाढा नक्षत्र तक ९ दिन की महाशक्तियों का पूजन होता हैं।

माध्वसंप्रदाय के अनुसार हनुमान जी की पूजा का नवरात्र में विशेष महत्व हैं। यह शरद नवरात्र में श्री हनुमानजी पूर्ण फ़ल प्रदान करते हैं और वे मनोकामना पूर्ण करते हैं इसमेंनवदिन पर्यन्त प्रतिदिन इन नवशक्तियों का क्रमशः पूजन करे यथा (१) अधरा एवं उत्तरा हनु (२) बुद्धि (३) आत्मबल (४) कीर्ति (५) धीरज (६) निडरता (७) आरोग्य (८) चुस्ती स्फुर्ति (९) भाषण सामर्थ्य ।

वैष्णव व माध्वसंप्रदाय में लक्ष्मीह्यग्रीव की उपासना भी विशेष मानी जाती है।

तुलसीकृत रामचरितमानस परायण नवरात्र में वैष्णव जन करते है।

वाल्मीकरामायण का प्रयोग करना चाहे तो कुमार संहितानुसार परायण विधि इस प्रकार हैं-

(१) बालकाण्ड सर्ग १ से ७७

(२) अयोध्याकाण्ड सर्ग १ से ६४

(३) अयोध्याकाण्ड सर्ग ६५ से ११९ तक

(४) अरण्यकाण्ड सर्ग १ से ६८ तक

(५) अरण्यकाण्ड सर्ग ६९ से ७५ तक तथा किष्किन्धाकाण्ड सर्ग १ से ४९ तक

(६) किष्किन्धाकाण्ड सर्ग ५० से ६७ तथा सुन्दरकाण्ड सर्ग १ से ५६ तक

(७) सुन्दरकाण्ड सर्ग ५७ से ६८ तक तथा युद्धकाण्ड १ से ५०

(८) युद्धकाण्ड सर्ग ५१ से १११

(९) युद्धकाण्ड ११२ से १३१ तक हैं।

इस तरह कुल ५३७ सर्ग तथा कुल श्लोक संख्या २०७२४ हैं।

चतुः नवरात्र विषय

महाकाल संहिता के अनुसार वर्ष में चार नवरात्र आते हैं अलग-अलग युग में अलग-अलग मास की महिमा रही हैं सत्ययुग में चैत्र शुक्लपक्ष, त्रैतायुग में आषाढ शुक्लपक्ष, द्वापर में माध शुक्लपक्ष, कलयुग में आश्विन शुक्लपक्ष की नवरात्र पूजा प्रधान हैं इसिलिए नवरात्री में नव दिन माँ जगदंबा का पूजन अवश्य करें साधक की सिद्धि हेतु

ॐ चामुण्डायै विच्चे

इस षडक्षरी मंत्र को सिद्धिप्रदाकहा गया हैं नवरात्र में मनोकामना पूर्ण हेतु इस मंत्र का जप अवश्य करें जप की कोइ संख्या नहीं हैं जितना हो सके उतना जाप भाव पूर्वक करो और व्रत उपवास भी कर सकते हो ।नवरात्री में ज्यादातर कलश का स्थापन करते हैं पहले चोकोर मिट्टी से बनाए इसमें ‘जौ’ कोरखना हैं थोड़ा पानी का सिंचन करना हैं इसकेउपर कलश रखेंऔरकलश में आम्र के५पान रखें इसके उपर श्रीफल रखें कलश का पूजन करें यह पहले से आप तैयार कर सकते हो । अब शारदीय नवरात्री का पूजन प्रयोग करें।

॥ शारदनवरात्रपूजा ॥

कर्ताप्रातःकृतनित्यक्रियःपूजांगत्वेनसंकल्पपूर्वंशुक्लतिलैःस्नात्वापरिहितधौतवासाःकुंकुमचंदनादिकृतपुंडो̭बद्धशिखःपूर्वाह्णेदशघटीमध्ये अभिजितन्मुहूर्तेवापीठेपत्न्यासहप्राङ्मुख उपविश्याचमनादिदेशकालकीर्तनांतेअमुकगोत्रस्यामुकशर्मणःसकुटुंबस्यसपरिवारस्यत्रिगुणात्मकश्रीदुर्गाप्रीतिद्वारासर्वापच्छांतिपूर्वकदीर्घायुर्विपुलधनधान्यसमृद्धिपुत्रपौत्राद्यविच्छिन्नसंततिवृद्धिस्थिरलक्ष्मीःकीर्तिलाभशत्रुपराजयविद्याविजयविविधश्रेयःसंपदाद्यभीष्टसिद्ध्यर्थं अद्यारभ्य नवमीपर्यंतंप्रत्यहमुपवासादिनियमोपेतःश्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीनवदुर्गापूजनमालाबंधनाखंडदीपप्रज्वालन (बलिदानचंडिकास्तोत्रपाठतन्मन्त्रजपकुमारीपूजन) ब्राह्मणसुवासिनीभोजनादिविविधनियमरूपंशारदनवरात्रमहोत्सवंकरिष्ये ॥

(संकल्पेन्यदपिकुलाचारानुसारेणयथायथमूहनीयं॥)तदंगत्वेनप्रतिपदिविहितंकलशस्थापनादिकरिष्ये ॥ गणेशंसंपूज्य स्वस्तिवाचनाद्यंतेआसनविधिं यथा शक्ति मूलमंत्रेणन्यासांश्चकरिष्ये ॥

॥अथासनविधिर्न्यासांश्च ॥ यथा ॥ आसनाधोजलादिनात्रिकोणं विलिख्य ॐह्रींआधारशक्तिकमलासनायनमः इत्याधारशक्तिंसंपूज्य तदुपर्यनुद्विग्नताकरंकुशकंबलाद्यन्यतममासनमास्तीर्य॥

जलमादायपृथ्वीतिमंत्रस्यमेरुपृष्ठऋषिः कूर्मोदेवता सुतलंछंदः आसनेविनियोगः॥

ॐपृथ्वीत्वयाधृतालोकादेवित्वंविष्णुनाधृता॥

त्वं चधारयमांदेविपवित्रंकुरुचासनं ॥ इतिमंत्रेणाधारशक्तिसंप्रार्थ्य ॥

ॐ भूर्भुवःस्वःइत्यासनंसंप्रोक्ष्य तदुपरिप्राङ्मुखउदङ्मुखो वाउपविश्य ॥

ॐअनंतासनायनमः ॥ कूर्मासनायनमः ॥ विमलासनायनमः ॥ पद्मासनायनमः ॥ योगासनायनमः ॥ आधारशक्त्यैनमः ॥ दुष्टविद्रावणनृसिंहासनायनमः मध्येपरमसुखासनायनमः इतिनत्वा ॥

ॐऊर्ध्वकेशिविरूपाक्षिमांस शोणितभक्षणे ॥

तिष्ठदेविशिखाबंधेचामुंडेह्यपराजिते ॥ इतिमंत्रेणशिखामाबध्य ॥

॥ अथबाह्यभूतशुद्धिः॥ अपसर्पंत्वि त्यस्यभूतान्यनुष्टुप् भूतोत्सारणेविनियोगः॥

ॐअपसर्पंतुतेभूतायेभूताभूमिसंस्थिताः ॥ येभूताविघ्नकर्तारस्तेनश्यंतुशिवाज्ञया॥

अपक्रामंतुभूतानिपिशाचाःसर्वतोदिशं ॥ सर्वेषामविरोधेनपूजाकर्मसमारभे ॥ इतिभूतान्युत्सार्य ॥

तीक्ष्णदंष्ट्रमहाकायकल्पांतर दहनोपम ॥ भैरवायनमस्तुभ्यमनुज्ञांदातुमर्हसि ॥ इतिभैरवाज्ञांगृहीत्वा ॥ गणपति पूजन, मातृका पूजन, पुण्याहवाचन,कुंभ स्थापन (घटस्थापन),त्रिखंडमुद्रयापुष्पंगृहीत्वास्वहृदिस्थांतेजोमयींदेवतांसचिंत्य-पुनस्तांमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीरूपेणविभाव्य

ब्रह्मरंध्रेणनासाद्वाराउच्छ्वासनेनपुष्पेसमानीय॥

॥ ध्यानं॥

अरुणकमलसंस्थातद्रजःपुंजवर्णाकरकमलधृतेष्टाभीतियुग्मांबुजाच॥

मणिमुकुट-विचित्रालंकृताकल्पजालैर्-भवतुभुवनमातासंततंश्रीः श्रियैनः॥

चतुर्भुजां-त्रिनेत्रांचवरदाभयपाणिका ॥

रक्तांबरधरांदेवीं दिव्यरूपां-नमाम्यहं ॥

अक्षस्रक्परशुंगदेषुकुलिशंपद्मंधनुःकुंडिकां

दंडंशक्तिमसिंचचर्मजलजंघंटासुराभाजनम् ॥

शूलंपाशसुदर्शनेचदधतींहस्तैःप्रसन्नाननां

सेवेसैरिभमर्दिनीमिहमहालक्ष्मींसरोजस्थिताम् ॥

इतिमहालक्ष्मींध्यात्वातत्पुष्पंमध्यकोष्ठस्थत्रिकोणेसंस्थापयेत् ॥एवं ॥

ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः

शङ्खं सन्दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् ।

नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां

यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥

इतिध्यात्वामहालक्ष्मीदक्षिणकोष्ठेमहाकालीमावाहयेत्॥ एवं ॥

ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं

हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम् ।

गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ॥

इतिध्यात्वामहालक्ष्मीवामकोष्ठेमहासरस्वतीमावाहयेत्॥एवमेव

मध्यकोष्ठेमहालक्ष्मीपुरतआरभ्यतत्तन्मत्रैर्नवदुर्गाःध्यात्वामहालक्ष्मीपरितआवाहयेत् ॥ तेमंत्राश्चयथा ॥

आगच्छ वरदे देवी दैत्यदर्पनिषूदिनि ॥ पूजां गृहाण सुमुखि नमस्ते शंकरप्रिये॥

सर्वतीर्थमयं वारि संवदेवसमन्वितम् । इमं घटं समागच्छ तिष्ठ देवि गणैः सहं ॥

दुर्गे देवि समागत्य सान्निध्यमिह कल्पय ॥बलिं पूजां गृहाण त्वमष्टाभिःशक्तिभिः सह ॥कल्याणजननीं सत्यांकामदां करुणाकरीम्॥ अनन्तशक्तिसंपन्नां दुर्गामावाहयाम्यहम्॥

साङ्गांसावरणां सायुधां दुर्गामावाहयामि ॥महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपिणि त्रिगुणात्मिकेदुर्गादेवि १- आवाहिता भव ॥ स्थापिता भव ॥सन्निहिता भव ॥ सन्निरुद्धा भव ॥ सम्मुखीकृता भव ॥ षडङ्गेनसकलीकृता भव॥ अवगुंठिता भव ॥ परमीकृता भव ॥ अमृतीकृता भव ॥ प्रार्थिता भव ॥नमस्कृता भव ॥प्रतिष्ठा सर्व०॥ ॐ मनोर्जूति०॥ इति प्रतिष्ठां कृत्वा ॥ दीपपात्रेबिन्दुत्रिकोण षट्कोणात्मकं यंत्रं विलिख्य ।

यंत्रस्थदेवताभ्यो नमः इति संपूज्य तन्मध्ये घृतं तैलं वा यथाविभवं प्रपूर्य दीपं प्रज्वाल्य

दीपस्थदेवतायै नमः इति संपूज्य प्रार्थयेत् ॥

भो दीप देवीरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत् ॥ यावद् कर्मसमाप्तिः तावत्त्वंस्थिरो भव ॥ दीपाय०॥ गन्ध पुष्पैः संपूज्य०॥

शैलपुत्री

जगत्पूज्येजगद्वंद्येसर्व शक्तिस्वरूपिणि।

पूजांगृहाणकोमारिजगन्मातर्नमोस्तुते॥

शैलपुत्र्यैनमः शैलपुत्रीम्आवाहयामि० ॥

ब्रह्मचारिणी

त्रिपुरांत्रिगुणाधारांमार्गज्ञानस्वरूपिणी।

त्रैलोक्यवंदितादेवींत्रिमूर्तिपूजयाम्यहं ॥

ब्रह्मचारिण्यै नमः ब्रह्मचारिणीम् आवाहयामि० ॥

चंद्रघंटा

कालिकांतुकलातीतांकल्याणहृदयांशिवां ।

कल्याणजननींनित्यंकल्याणीपूजयाम्यहं ॥

चंद्रघंटायै नमः चंद्रघंटाम् आवाहयामि० ॥

कूष्मांडायै

अणिमादिगुणोदारांमकराकारचक्षुषं ।

अनंतशक्तिभेदांतांकामाक्षींपूज्याम्यहं ॥

कूष्मांडायै नमः कूष्मांडाम् आवाहयामि० ॥

स्कन्दमाता

चंडवीरांचंडमायांचंडमुंडप्रभंजिनीं ।

तान्नमामिचदेवेशीचंडिकांपूजयाम्यहं ॥

स्कंदमात्रेनमःस्कंदमातृः आवाहयामि०॥

कात्यायनी

सुखानंदकरीशांतांसर्वदेवैर्नमस्कृतां ।

सर्वभूतात्मिकादेवींशांभवीपूजयाम्यहं ॥

कात्यायन्यैनमः कात्यायनीम्आवाहयामि०॥

कालरात्री

चंडवीरांचंडमायांचंडमुंडप्रभंजिनीं ।

तान्नमामिचदेवेशींगायत्रींपूजयाम्यहं ॥

कालरात्र्यैनमः कालरात्रीम्आवाहयामि०॥

महागौरी

सुंदरीस्वर्णवर्णागीं सुखसौभाग्यदायिनी ।

संतोषजननींदेवींसुभद्रांपूजयाम्यहं ॥

महागौर्यै नमः महागौरीम्आवाहयामि०॥

सिद्धिदात्रीं

दुर्गमेदुस्तरेकार्येभयदुर्गविनाशिनीं।

पूजयामिसदाभक्त्यादुर्गादुर्गार्तिहारिणीं ॥

सिद्धिदायै नमः सिद्धिदात्रीम् आवाहयामि०॥

ततः षोडशोपचारैः पूजनम् ॥ एैंह्रींक्लीं चामुंडायै विच्चे॥

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी॥ दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥ इति मन्त्राभ्यां श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरुपिणीत्रिगुणात्मिकायैश्रीदुर्गादेवतायै नमः”

आवाहन –

हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो मऽआवह ॥

सहस्त्रशीर्षा पुरुष:सहस्राक्ष:सहस्रपात् ।

स भूमि सर्वत: स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्द्शाङ्गुलम् ॥

तप्तकांचनसंकाशांमुक्ताभरणभूषितां ॥

रत्नसिंहासनासीनांवंदेतांवैमहेश्वरीं ॥ आवाहनं० ॥

आसनं –

तामंऽआवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।

यस्यां हिरण्यं विन्देयंगामश्वं पुरुषानहम्॥

पुरुषऽएवेद सर्वंयद्भूतं यच्च भाव्यम् ।

उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥

खड्गशूलगदाहस्तामभयंदधतीं करैः ।

गजारूढांमहादेवीं, सर्वेश्वर्यप्रदायिनीं ॥आसनं० ॥

पाद्यं-

अश्वपूर्वां रथमध्यांहस्तिनाद प्रबोधिनीम् ।

श्रियं देवीमुपह्वयेश्रीर्मा देवीजुषताम्॥

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतंदिवि॥

विद्याधरीं महादेवींपद्माभांलोकनायकां ।

सर्वैश्वर्यप्रदांदेवींमहालक्ष्मींप्रपूजये॥ पाद्यं० ॥

अर्घ्यं –

कां सोस्मितां हिरण्यप्रकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।

पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषःपादोऽस्येहाभवत्त्पुनः ।

ततो विष्वङ्व्यक्रामत्साशनानशनेऽअभि ॥

दधिदूर्वाक्षतायुक्तंगंगातोयसमन्वितं ॥

अर्घ्यगृहाणभोदेविमयाभक्त्यानिवेदितं ॥अर्घ्यं० ॥

आचमनं

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।

तां पद्मिनीमीं शरणमहंप्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥

तस्माद्यज्ञात्सर्व्वहुतः सम्भृतंपृषदाज्ज्यम् ।

पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥

नानारत्नप्रभांदेवींनानागणसमन्वितां ।

नारायणीमहालक्ष्मीं वंदेतांविष्णुवल्लभां॥आचमनं० ॥

मलापकर्षस्नानं –

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्षबिल्वः ।

तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।

वसन्तोऽस्यासीदाज्यंग्रीष्मSइध्म: शरद्धवि: ॥आपोहिष्ठेतिमलापकर्षस्नानं॥

ततःपंचामृतंआप्यायस्वेत्यादिमंत्रैःपौराणैश्चपृथक्कार्यं॥

दधिमध्वाज्यसंयुक्तशर्कराभिःसमन्वितं॥गंगोदकंसमानीतंत्वंगृहाणसुरेश्वरि ॥

गन्धद्वारां दुराधर्षां, नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।

ईश्वरीं सर्वभूतानांतामिहोपह्वये श्रियम् ॥ इति गन्धोदकं०॥

कनिक्रदत्०इतिमांगलिकस्नानं।

पूर्वपूजांसमाप्य ततःश्रीसूक्तेन-पुरुषसूक्तेनचाभिषेकंकुर्यात्॥आचमनं०॥

वस्त्रं-

उपैतु मां दैवसखःकीर्तिश्च मणिना सह ।

प्रादुर्भूतो सुराष्ट्रेऽस्मिन्कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥

तंयज्ञंबर्हिषि प्रौक्षन्पूरुषंजातमग्रत: ।

तेन देवाऽअयजन्त साध्याऽऋषयश्च ये ॥

मुक्तामणिगणस्पर्शस्फुरत्कंचुकमुत्तमं ।

पीतांबरंसोत्तरीयंगृहाणपरमेश्वरि ॥ वस्त्रं०॥ आचमनं॥

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।

अभूतिमसमृद्धिं चसर्वां निर्णुद मे गृहात्॥

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत: सम्भृतंपृषदाज्यम् ।

पशूंस्न्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥

नानासिद्धिप्रदांदेवींनानागुणविवर्धिनीं।

नानासूत्रधरांदेवींसर्वलोकमहेश्वरीं ॥उपवस्त्रं० ॥

कंठ सूत्रं –

तप्तकांचनसंकाशांमहालक्ष्मींवरप्रदां ।

नानाभरणशोभाठ्यांवंदेतांवरदासनां॥

महागुणसमायुक्तं नानामणिसमन्वितं।

कंठसूत्रंमयानीतंगृहाणभक्तवत्सले॥ कंठ सूत्रं ० ॥

गंध –

गन्धद्वारां दुराधर्षांनित्यपुष्टां करीषिणीम्।

ईश्वरीं सर्वभूतानांतामिहोपह्वये श्रियम् ॥

तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतऽऋचः सामानि जज्ञिरे ।

छन्दाँसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्त्तस्म्मादजायत ॥

चंदनागरुकर्पूरकुंकुमारोचनैस्तथा।

कस्तूर्यादिसुगंधंचसर्वांगेषुविलेपये॥ गंध०॥

अक्षतान्-

अक्षतान्निर्मलान्शुद्धान्मुक्तामणिसमप्रभान् ।

गृहाणेमान्महादेविदेहिमेनिर्मलांधियं ॥

अक्षतान्०हरिद्रां० कुंकुमं० सिन्दूरं० कज्जलं०॥

पुष्पाणि-

मनसः काममाकूतिंवाचः सत्यमशीमहि ।

पशूनां रूपमन्नस्यमयि श्रीः श्रयतां यशः ॥

तस्मादश्वाऽअजायन्त ये के चोभयादतः ।

गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाताऽअजावयः ॥

मंदारपारिजातादिपाटलीकेतकानिच ।

जातीचंपकपुष्पाणिगृहाणेमानिशोभने ॥ पुष्पाणि० ॥

पुष्पमाला –

पद्मशंखजपुष्पादिशतपत्रैर्विचित्रितां ।

पुष्पमालांप्रयच्छामिगृहाणत्वंसुरेश्वरि ॥ पुष्पमाला० ॥

बिल्वपत्रं –

अमृतोद्भवःश्रीवृक्षोमहादेवप्रियःसदा ।

बिल्वपत्रं प्रयच्छामिपवित्रंतेसुरेश्वरि ॥बिल्वपत्रं० ॥

पल्लवान्-

उग्रद्वारेचोग्रमयिदुष्टासुरनिबर्हिणि ।

पूजांकरोमिचार्वंगिपल्लवैर्नंदनोद्भवैः ॥पल्लवान्० ॥

फ़लमालां –

शरत्कालेसमुद्भूतांनिशुंभेमर्दिते-त्वया।

फलमालांवरांदेविगृहाणसुरपूजिते ॥फ़लमालां० ॥

अथांगपूजा –

दुर्गायैनमः पादौ पूजयामि॥ महाकाल्यै नमःगुल्फौपूजयामि ॥ मंगलायै नमः जानुद्वयंपूजयामि ॥ कात्यायन्यै नमः अरूपूजयामि ॥ भद्रकाल्यै नमः कटिंपूजयामि ॥ कमलवासिन्यै नमः नाभिपूजयामि ॥ शिवायै नमः उदरंपूजयामि ॥ क्षमायै नमः हृदयंपूजयामि॥ कौमार्यै नमः स्तनौपूजयामि ॥ उमायै नमः हस्तौ पूजयामि ॥ महागौर्यै नमः दक्षिणबाहुंपूजयामि ॥ वैष्णव्यै नमःवामवाहुंपूजयामि ॥ रमायै नमः स्कंधौपूजयामि ॥ स्कंदमात्रे नमः कंठंपूजयामि ॥ महिषमर्दिन्यै नमः नेत्रेपूजयामि ॥ सिंहवाहिन्यै नमः मुखंपूजयामि ॥ महेश्वर्यै नमः शिरः पूजयामि ॥

कात्यायन्यै नमः सर्वांगंपूजयामि ॥

अथावरणपूजा –

महालक्ष्मीपश्चिमकोष्ठे स्वरयासहविरिंचयेनमः स्वरयासहविरिंचिश्रीपादुकां पूजयामि॥ तद्दक्षिणकोष्ठे गौर्यासहरुद्रायनमः गौर्यासहितरुद्रश्रीपादुकांपू० ॥वामकोष्ठे लक्ष्म्यासहहृषीकेशायनमः लक्ष्म्या सहहषीकेशश्रीपादुकांपू० ॥ महालक्ष्मीपुरःकोष्ठेअष्टादशभुजायैनमः अष्टादशभुजाश्रीपादुकां० ॥तद्वामकोष्ठे दशाननायैनमः दशाननाश्रीपादुकांपू० ॥ दक्षिणकोष्ठे अष्टभुजायै० अष्टभुजाश्रीपा० ॥ अभीष्टसिद्धिंमेदेहिशरणागतवत्सले ॥

भक्त्या समर्पयेतुभ्यंप्रथमावरणार्चनं ॥१॥

प्रथमावरणार्चनेनश्रीमहालक्ष्मीः प्रीयतां ॥

षट्कोणेमहालक्ष्मीपूर्वकोणमारभ्ययथाक्रमं

ऐंहृदयायनमः हृदयश्रीपादुकांपू० ॥ ह्रींशिरसेस्वाहा शिरःश्रीपा० ॥ क्लींशिखायैवषट् शिखाश्रीपा० ॥ चामुंडायैकवचाय हुं कवचश्रीपा० । विञ्चेनेत्रत्रयायवौषट् नेत्रत्रयश्रीपा० ॥ ऐंह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चेअस्त्रायफट् अस्त्रश्रीपा०॥

तत्रैवमहालक्ष्मीपुरःकोणमारभ्य

हिरण्यायै० हिरण्याश्रीपा० ॥ चंद्रायै० चंद्राश्रीपा० ॥ रजतस्रजायै० रजतस्रजाश्री० ॥

हिरण्यस्रजायै हिरण्यस्रजाश्रीपा० ॥ हिरण्याक्षायै० हिरण्याक्षाश्रीपा० ॥

हिरण्यवर्णायै० हिरण्यवर्णाश्रीपा०॥ अभीष्टसिद्धिं० ॥२॥

ततःषड्दलेसंधिषु०॥ देवीपुरोदलमारभ्य ॥ वसंताय० ॥ ग्रीष्माय० ॥ वर्षांभ्यः०॥शरद्भ्यः० ॥ हेमंताय०॥ शिशिराय०॥अभीष्टसिद्धिं० ॥३॥

अष्टदलेमहालक्ष्मीपुरोदलमारभ्ययथाक्रमंप्रदक्षिणं ।

ब्राह्म्यै नमःब्राह्मीश्रीपादुकां० ॥ एवंसर्वत्र ॥ माहेश्वर्यै० ॥ कौमार्यै० ॥ वैष्णव्यै० ॥ वाराह्यै० ॥ इंद्राण्यै० ॥ चामुंडायै० महालक्ष्म्यै० ॥ तत्रैवपूर्वक्रमेणप्रदक्षिणं ॥

पद्मासनायैः ॥ पद्मवर्णायै० ॥ पद्मस्थायै० ॥ आर्द्रायै० ॥ तर्पयंत्यै० ॥ तृप्तायै० ज्वलंत्यै० ॥ हिरण्यप्राकारायै० ॥ तत्रैव पूर्वक्रमेणप्रदक्षिणं ॥ असितांगभैरवाय० ॥ रुरुभैरवाय० ॥ चंडभैरवाय० ॥ क्रोधभैरवाय० ॥ उन्मत्तभैरवाय० ॥ कपालभैरवाय० ॥ भीषणभैरवाय० ॥ संहारभैरवाय० ॥ अभीष्टसिद्धिं० ॥४॥

महालक्ष्मीपृष्ठतः पूर्वदिशमारभ्य ॥

इंद्रायनमः इंद्रश्रीपा० ॥ एवंअग्नये०॥ यमाय० ॥ निर्ऋतये० ॥ वरुणाय० ॥ वायवे० ॥ सोमाय० ॥ ईशानाय० ॥ अभीष्ट० ॥५॥

अष्टदलसंधिषु ॥ आदित्याय० सोमाय० ॥ अंगारकाय० ॥ बुधाय० ॥ बृहस्पतये० ॥ शुक्राय० ॥ शनैश्चराय० ॥ राहु केतुभ्यो० ॥ अभीष्टसिद्धिं०॥६॥

द्वादशदलमूलेषुदेवीपुरोभागमारभ्यप्रदक्षिणं ॥

मेषाय० ॥ वृषभाय०॥ मिथुनाय०॥ कर्काय० ॥ सिंहाय०॥ कन्यायै० ॥ तुलायै० ॥ वृश्चिकाय० ॥ धनुषे० ॥ मकराय० ॥ कुंभाय० ॥ मीनाय० ॥ अभीष्टसिद्धिं० ॥७॥ द्वादशदलमध्येषुपूर्वदलमारभ्यप्रदक्षिणं ॥

मधवे० ॥ माधवाय० ॥ शुक्राय० ॥ शुचये० ॥ नभाय० ॥ नभस्याय० ॥ इषाय० ॥ ऊर्जाय० ॥ सहाय० ॥ तैषाय० ॥ तपसे० ॥ तपस्याय० ॥ अभीष्ट० ॥८॥

पुनःद्वादशदलाग्रेषुपूर्वक्रमेण ॥

दीप्तायै० ॥ सूक्ष्मायै० ॥ जयायै० ॥ विमलायै० ॥ लक्ष्म्यै० ॥ श्रियै० ॥ गौर्ये० ॥ तुष्ट्यै० ॥ बुद्ध्यै० ॥ शांतायै० ॥ कांत्यै० ॥ महालक्ष्म्यै० ॥ अभीष्ट० ॥९॥

धूप-

कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम ।

श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।

वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्मऽइध्म: शरद्धवि: ॥

दशांगंगुग्गुलंधूपंचंदनागरुसंयुतं ।

समर्पितंमयाभत्त्यामहालक्ष्मिप्रगृह्यतां॥ धूपं०॥

दीपं-

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।

नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत: ।

ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्या शूद्रोऽअजायत ॥

घृतवर्तिसमायुक्तंमहातेजोमहोज्ज्वलं ।

दीपंदास्यामिगिरिजेसुप्रीताभवसर्वदा ॥दीपं०॥

नैवेद्यं-

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीम् ।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मींजातवेदो मऽआ वह ॥

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षो: सूर्यो अजायत।

श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥

अन्नंचतुर्विधंस्वादुरसैःषड्भिःसमन्वितं ।

नैवेद्यंगृह्यतांदेविभक्तिंमेह्यचलांकुरु ॥नैवेद्यं०॥

हस्तप्रक्षालनं-

गंधतोयंसमानीतंसुवर्णकलशेस्थितं।

हस्तप्रक्षालनार्थायपानीयंतेनिवेदये ॥हस्तप्रक्षा०॥

फ़लम् –

द्राक्षाखर्जूरकदलीपनसाम्रकपित्थकं ।

नारिकेलेक्षुजंब्वादिफलानिप्रतिगृह्यतां ॥फ़लम् स०॥

तांबूलं –

एलालवंगकस्तूरीकर्पूरैःपुष्पवासितां ।

वीटिकांमुखवासार्थमर्पयामिसुरेश्वरि ॥तांबूलं०॥

दक्षिणां-

पूजाफलसमृद्ध्यर्थंतवाग्रेस्वर्णमीश्वरि ।

स्थापितंतेनमेप्रीतापूर्णान्कुरुमनोरथान्॥दक्षिणां०॥

नीराजनं-

कौशेयवर्तिसंयुक्तंगोघृतेनसमन्वितं ।

नीराजनंमयादत्तंगृहाणपरमेश्वरि॥ नीराजनं० ॥

नमस्कारान्-

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।

सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो मऽआ वह॥

नाभ्याऽआसीदन्तरिक्ष शीर्ष्णो द्यौः समवर्त्तत ।

पद्भ्यां भूमिर्दिश: श्रोत्रात्तथा लोकांऽअकल्पयन् ॥

नमस्तेदेवदेवेशिनमस्तेईप्सितप्रदे॥

नमस्तेदेवदेवेशिनमस्तेशंकरप्रिये॥नमस्कारान्० ॥

प्रदक्षिणा-

तां मऽआ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।

यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥

सप्तास्यासन्परिधयस्त्रि: सप्त: समिध: कृता: ।

देवा यद्यज्ञन्तन्वानाऽअबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥

यानिकानिच० ॥प्रदक्षिणाः० ॥

मंत्रपुष्पं –

य: शुचि: प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।

सूक्तं पंचदशर्चं च श्रीकाम: सततं जपेत् ॥

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।

ते ह नाकं महिमान: सचन्त यत्र पूर्वे साध्या: सन्ति देवा: ॥

दामोदरिनमस्तेस्तुनमस्त्रैलोक्यनायके।

नमस्तेस्तुमहालक्ष्मित्राहिमांपरमेश्वरि॥मंत्रपुष्पं० ॥

मालार्पणं –

नानापुष्पकृतांमालांनानापुष्पैःसमन्वितां ।

प्रयच्छामिसुरेशानिसुप्रीतावरदाभव ॥मालार्पणं० ॥

प्रार्थना-

पूजाफलाग्निकार्याद्यैःसुकृतंयन्मयार्चितं ॥

तत्सर्वंफलदंमेस्तुभुक्तिमुक्त्यर्थदेहिमे ॥

लक्ष्मित्वत्प्रज्ञ यानित्यं कृतापूजातवाज्ञया।

स्थिराभवगृहेह्यस्मिन्ममसंतानकारिणी ॥

न्यूनवाप्यधिकंवापियन्मयामोहतःकृतं॥

सर्वतदस्तुसंपूर्णंत्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥

ममाभीष्टप्रदानित्यंभवसुप्रीतमानसा॥इतिप्रार्थना॥

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।

पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरी ।

यत्पूजितं मया देव! परिपूर्ण तदस्तु मे॥

विष्णवे नमः विष्णवे नमः विष्णवे नमः ॥

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